शनिवार, 27 सितंबर 2014

"माँ" (डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द')

माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।
तुम ही मेरी पूजा अर्चन, तुम ललाट की रोली हो।।
माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।।

तुमने धरती सम धारणकर, मुझको हरदम ही है पाला,
भूख सही है हरदम तुमने, पर मुझको है दिया नेवाला,
नही कदम जब मेरे चलते, ऊंली पकड़ संग हो ली हो।।
माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।।

धीरे-धीरे स्नेह से तेरे, मैने चलना थोड़ा सीखा,
पर आहट जब मिली कहीं कि, लाल हमारा थोड़ा चीखा,
दौड़ पड़ी नंगे पद हे माँ, करूण स्वरों में तुम बोली हो।।
माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।।

बिना तुम्हारे सारा जीवन, ता माते है यह रीता,
जब तक है आशीष तुम्हारा, तब तक मै हूँ जग को जीता,
तुम तो हो ममता की मूरत, सुखद स्नेह की झोली हो।।
माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।।

र तुम्हारे ऊपर अपना, सारा जीवन अर्पित कर दूॅ,
नही मिटेगा कर्ज तुम्हारा, चाहे सभी समर्पित कर दूॅ,
भले कुपुत्र हुआ मै बालक, कभी नही तुम डोली हो।।
माँ तुम कितनी भोली हो, माँ तुम कितनी भोली हो।।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

"हिन्दी महिमा" (डॉ.महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द')

          
हिन्दी मे गुण बहुत है, सम्यक देती अर्थ।
भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्कृति सहित समर्थ।।1।।
--
वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध।
जिसका व्यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध।।2।।
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निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद।
एका लाये राष्ट्र में, दे बहु मन आमोद।।3।।
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बिन हिन्दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्पज्ञ।
भाव व्यक्त नहि कर सकें, लगे नही मर्मज्ञ।।4।।
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शाखा हिन्दी की महत्, व्यापक रूचिर महान।
हिन्दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान।।5।।
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हिन्दी संस्कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान।
जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण।।6।।
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हिन्दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह।
त्यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह।।7।।
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निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार।
हर जन भाषा का करे, सम्यक सबल प्रसार।।8।।
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देश प्रेम अनुरक्ति का, हिन्दी सबल आधार।
हिन्दी तन मन में बसे, आओ करें प्रचार।।9।।
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हिन्दी हिन्दी सब जपैं, हिन्दी मय आकाश।
हिन्दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्य प्रकाश।।10।।
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हिन्दी ने हमको दिया, स्वतन्त्रता का दान।
हिन्दी साधक बन गये, अद्भुत दिव्य प्रकाश।।11।।
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नही मिटा सकता कोई, हिन्दी का साम्राज्य।
सुखी समृद्धिरत रहें, हिन्दी भाषी राज्य।।12।।
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हिन्दी में ही सब करें, नित प्रति अपने कर्म।
हिन्दी हिन्दुस्थान हित, जानेंगे यह मर्म।।13।।
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ज्ञान भले लें और भी, पर हिन्दी हो मूल।
हिन्दी से ही मिटेगी, दुविधाओं का शूल।।14।।
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हिन्दी में ही लिखी है, सुखद शुभद बहु नीति।
सत्य सिद्ध संकल्प की, होती है परतीति।।15।।
--
आकाशवाणी अल्मोड़ा (4.9.10), 
चनाकार, शबनम साहित्य परिषद् (20.10.10)

शनिवार, 19 जनवरी 2013

एड्स चालीसा


एड्स चालीसा
दोहा:- महाशाप  अवगुण सदा, एड्स  रोग  भयवान।
पकड़ मौत निश्चित करें, नहि जिससे कल्याण।।

सतोगुणी नर  की  जयकारा। निन्दउ पतिव्रत  हीन  अचारा।।
निज  पत्नी नहि रास रचैया। निन्दा  उनकी  हरदम  भैया।।
ओ कुत्सित  मन  के अनुरोधा। उनके जीवन विविध विरोधा।।
जिनके मन नहि शुद्ध आचरणा। विविध रोग के है निज वरणा।।
नही  समर्पण  जिनके  मनहीं। दुःखी रहे वह हर छन-छनही।।
निज  स्वामी  अनुरक्त बनाओ। हे प्रभु मम वह बुद्धि दिखाओ।।
सरवा  सत्य यह बातहि जानो। सदा  समर्पण  को मन मानो।।
होइ  अगर  आचरण  विहीना। मिले सदा दुःख नवल नवीना।।
एड्स  रोग पहिले नहि आवा। भाॅति  भाॅति लक्षण दिखलावा।।
तन  कमजोर करे  हर भाॅती। चिन्तित जन मन हर दिन राती।।
दर्द पैर  नहि दूर  है  होता। होत  रात  जन  लगता  रोता।।
मेरू  रज्जु  बहु  पीड़ा होती। निकल  गयी ताकत की मोती।।
चर्म रोग  फुंसी  अरू  छाले। भाॅति  भाॅति  दिखते बहु बाले।।
वैद्य  पड़ा  असमंजस  भाई। ठीक  नही  कर  सकी  दवाई।।
लोग  न  जाने  चिन्ता होई। घुट  घुट कहता मन यह रोई।।
बीबी   जान  न  जाय  बीमारी ।  छूटेगी   सब  रिश्तेदारी।।
दस्त  होइ  जब  बारम्बारा । तेज हरण  मुख हुआ छुआरा।।
गाल  पिचक बन गए छुआरू । विपद् दशा प्रभु आप उबारू।।
बदन ताप नित ही दिख जाहीं। भूख मरी  मन इच्छा नाहीं।।
गलत  कर्म  कैसे  बतलाऊॅ । चिन्ता  बस कैसे  बच पाऊॅ।।
हे  भगवान  करो कल्याणा । गलती  मैने  अपनी  माना।।
सर्दी  खाॅसी  बहुत  सताई । हाल  चाल नहि  पूछे  भाई।।
भाॅति भाॅति  जन  बात बनावा । दूर- दूर सब  हंसी  उड़ावा।।
बीबी  पुत्र न  आवहि पासा । व्यंग्य  बात करते  बहु हांसा।।
हे  बलनाशक  तेज हरावा । भाॅति- भाॅति  के रूप देखावा।।
तुम नर को अति नीच बनावा। चाल कुचालि बहुत दिखलावा।।
जिन  पर रोग एड्स की होई। दूर  उन्हे  नहि  करना कोई।।
प्रेम  उन्हंे  भरपूर  दिलाना। सेवा  विविध  भाॅति  करवाना।।
तड़प  रहे जीवन हित प्यारे। वे  तो  है  विपदा  के  मारे।।
नहिं  होता यह हाथ मिलाई। तुम  सिरिंज नित बदलो भाई।।
खून  जाॅच  करके चढ़वाओ। लगे  नोट  उस पर पढ़वाओ।।
गलत कर्म नहि कर भूपाला। सुख सज्जित रह करो नेवाला।।
जो  पत्नी पति व्रत अनुरागी। रहै  सदा  सुखरस  रसपागी।।
जो  पति पत्नी व्रत अनुरागा। कुशल  रहे नित वही सुभागा।।
कुलनाशी जो नर अरू नारी। पकडे़  उनको  एड्स बीमारी।।
भारत  के तुम  भरत सपूता। रहैं  सदा  तोहि में बहु बूता।।
भारतीय संस्कृति  अपनाना। गाओ  नित्य सुखद नित गाना।।
अस हनुमन्त बाल ब्रह्मचारी। तेज  कीर्ति  गावे  नर  नारी।।
कहत ‘नन्द’ मति मन्द विचारी। सुखी भवन निज सब परिवारी।।
मेरा  यह  संदेश  बताना। सदा  समर्पण  सब   अपनाना।।

दोहा - हो भारत  के वंश तुम,  तुम हो  देव समान।
         एड्सहीन जग को करो, करो जगत कल्याण।।

डाॅ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ‘‘नन्द’’
 रा0 इ0 का0 द्वाराहाट अल्मोड़ा उत्तराखण्ड
दूरभाष - 09410161626
 e-mail-  mp_pandey123@yahoo.co.in

रविवार, 10 जून 2012


परिवर्तन
है अनुभव अब अन्त हुये, जग की परिभाषायें बदली।
वह किरण आस की लुप्त हुयी, जीवन की आशायें बदली।
परिवर्तन के इस रौद्र रूप में, क्या क्या परिवर्तित होगा।
यह जान सोच मन थक जाये, लोगों की अभिलाषायें बदली।।
उपकार जगत से दूर हुआ, बदले हर जन निज कर्मों से।
आहत मन करना काम रहा, पदच्युत नित होते धर्मों से।
हे युग के संचालक मालिक, मधुरिम सुखद हटायें बदली।।
भाषण में कोई कसर नही, पर कर्म नही हो पाता है।
कन्या की हत्या जली बधू को, न्याय नही मिल पाता है।
पश्चिमी हवायें है हावी, पूरब की दिव्य हवायें बदली।।
कहना कुछ है, करना है कुछ, इनसान यहाॅ पर करता है।
हर मिनट मिनट पर पाप चक्र, नित मन में सदा मचलता है।
बरसात स्नेह का हो कैसे, जब गुण धर्म घटायें बदली।।

मूक करुण स्वर
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहाॅ न होता यह संसार।
शान्ति अवनि है नभ का प्रांगण,
              शान्ति प्रकृति का नीरव नर्तन।
नीरवता का राज्य रहेगा,
              नीरव अनिल अनल पय धार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहाॅ न होता यह संसार।।1।।
अनावरित हो हिय मंजूशा,
              बने चकोरी चॅद्र पियूषा,
सच्चे होयें सपने अपने,
              अमित कल्पना हो साकार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहाॅ न होता यह संसार।।2।।
हम तुम होंगे दोनो एक,
              वहाॅ न होगंे विघ्न अनेक,
सुख के सारे साज सजेंगें,
              अपना रचित नया संसार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहाॅ न होता यह संसार।।3।।
प्रणय मिलन की प्रबल पिपासा,
              चिर संचित उर की अभिलाशा,
क्षण में तृप्ति बनेगी सारी,
              नीति नव प्रीति रीति व्यवहार।
आओ चलें क्षितिज के पार,
              जहाॅ न होता यह संसार।।4।।


भजन (भोजपुरी)
मधुरी बंसुरिया बाजी कहिया, गोपाल प्यारे।
कब तूॅ चोरइब, व्रज में दहिया, गोपाल प्यारे।
रोवेली राधा रानी, नयना से ढरे पानी।
तोहरे विरहवा कारन, खइहैं जहरवा सानी।
प्रीतिया लगाके धइलऽ रहिया, गोपाल प्यारे।। मधुरिया...........
गोपियन के गगरी फोरिके, चीरवा चोरइबऽ कबले।
गइया चरइब मोहन, रसिया रचइबऽ कबले।
ऊजरी बिरजवा अइबऽ तहिया गोपाल प्यारे।। मधुरिया............
रावण के मारे खातिर, रामजी के देहियां धइलऽ।
मनवा तूॅ पार तनी, कंस मामा बधवा कइल।
बनिके मयनवा मोहबऽ, कहिया गोपाल प्यारे।। मधुरिया..............


नारी
है कोटि नमन, है कोटि नमन , है कोटि नमन उस नारी को।
जो रत्न प्रसविनी बनकर के , जनता का भार उठाती है,
नित  अपने तन मन धन देकर, हम सबका प्राण जिलाती है,
है धरा रूप मे सदा प्रकट , है कोटि नमन उस नारी को।। 1।।
मनु सृष्टि समर्थ नही जब थे , सतरूपा का फिर साथ मिला ,
माॅ की ममता को पाकर के , जग जन्म लिया संसार खिला ,
नारी ही सत्य की रूप सदा , है कोटि नमन उस नारी को।। 2।।
कवियो की वाणी में भी तुम, रस पियूष सी बहती हो,
माॅ बनकर नर को जनने में, तुम सदा कष्ट ही सहती हो,
है भाव भवानी के जैसे , है कोटि नमन उस नारी को।।3।।
पति की सेवा में रत रहकर ,तुम माता सावित्री सीता,
जीवन का दर्शन सदा दिया , तुम ज्ञान दर्शिनी हो गीता,
जो तुलसी की प्रियरत्ना है , है कोटि नमन उस नारी को।।4।।
इन्दिरा बन अद्भुत करो कर्म , धन धरा धरित्री पर आवें ,
मन मोद मिले तेरे जन को , सब जन तुझसे ही सुख पावें ,
आदर्श नया रच दे जो ही , है कोटि नमन उस नारी को।।5।।
तुम आगे बढ़कर शासन की, अब डोर संभालो हे नारी ,
शिक्षा दीक्षा विज्ञान ज्ञान, अभिधान संभालो हे नारी ,
तुम बिना पुरूष के हो सूनी , आदर्श मिटा दो हे नारी,
तुम बिना जगत बेकार बना , आदर्श सिखा दो हे नारी,
आगे पथ नित्य निरंतर जो , है कोटि नमन उस नारी को ।
है कोटि नमन, है कोटि नमन , है कोटि नमन उस नारी को।।6।।


माॅ
माॅ तुम कितनी भोली हो, माॅ तुम कितनी भोली हो।
तुम ही मेरी पूजा अर्चन, तुम ललाट की रोली हो।।
माॅ तुम ...........
तुम्ही धरा सी धारण करके, मुझको हरदम ही है पाला,
भूख सहा है हरदम तुमने, पर मुझको है दिया नेवाला,
नही कदम जब मेरे चलते, ऊंगली पकड़ संग हो ली हो।।
माॅ तुम .............
धीरे - धीरे स्नेह से तेरे, मैने चलना थोड़ा सीखा,
पर आहट जब मिली कहीं कि, लाल हमारा थोड़ा चीखा,
दौड़ पड़ी नंगे पद हे माॅ, करूण स्वरों में तुम बोली हो।।
माॅ तुम ..............
बिना तुम्हारे सारा जीवन, लगता माते है यह रीता,
जब तक है आशीष तुम्हारा, तब तक मै हूॅ जग को जीता,
तुम तो हो ममता की मूरत, सुखद स्नेह की झोली हो।।
माॅ तुम .............
अगर तुम्हारे ऊपर अपना, सारा जीवन अर्पित कर दूॅ,
नही मिटेगा कर्ज तुम्हारा, चाहे सभी समर्पित कर दूॅ,
भले कुपुत्र हुआ मै बालक, कभी नही तुम डोली हो।।
माॅ तुम .................

रविवार, 31 जुलाई 2011

तब और अब

वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ, जिसको हमने अपनाया है।
अपनी संस्कृति को त्याग-त्याग, फिर गीत उन्हीं का गाया है।।

चाय काफिया काफी को, छोड़ा उन लोगो ने लाकर।
हमने फिर ग्रहण किया उसको, उनका सहयोग सदा पाकर।
अमृत सम दुग्ध धरित्री से, जाने का गीत सुनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।1।।

पहले कपड़े सम्पूर्ण अंग को, भर शृंगार कर देता था।
जब अंगराग से पूरित तन, मन में उमंग भर देता था।
मृदु महक धरा से दूर हुयी, परफ्यूम ने धूम मचाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।2।।

जनक पिता बापू कहते, सन्तोष बहुत मिल जाता था।
भैया चाचा दीदी बेटी, सुनने से दिल खिल जाता था।
पापा कहने से मिटा लिपिस्टिक जब, डैडी का चलन बढ़ाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।3।।

धोती कुर्ता रमणीय वेष, खद्दर की टोपी दूर हुयी।
डिस्को क्लब सिगरेट चषक, की भार बहुत भरपूर हुयी।
कटपीस के कटे ब्लाउज ने, भारत में आग लगाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।4।।

बच्चा पैदा होते ही अब, अंग्रेजी मे ही रोता है।
ए बी सी डी को सीख सीख, हिन्दी की गति को खोता है।
सब छोड़ संस्कृति देवों की, दानव प्रवृत्ति अपनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।5।।

थे राम कृष्ण अवतार लिये, यह बात बताया भारत में।
चैत्र मास से ऋषियों ने, नव वर्ष चलाया भारत में।
चले गये अंग्रेज मगर, अंग्रेजी नव वर्ष मनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।6।।

काल खोलकर मुँह बैठा, पर हैप्पी बर्थ मनाते है।
मन मन्दिर में जो प्रेम छिपा, आई लव यू कह कर गाते है।
सम्पूर्ण नग्नता छाने को, यह पाँप का म्यूजिक आया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।7।।

अपनी संस्कृति को त्याग-त्याग, फिर गीत उन्हीं का गाया है।

अपनी संस्कृति को त्याग-त्याग, फिर गीत उन्हीं का गाया है।
महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय 'नन्‍द'-

वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ, जिसको हमने अपनाया है।
अपनी संस्कृति को त्याग-त्याग, फिर गीत उन्हीं का गाया है।।

चाय काफिया काफी को, छोड़ा उन लोगो ने लाकर।
हमने फिर ग्रहण किया उसको, उनका सहयोग सदा पाकर।
अमृत सम दुग्ध धरित्री से, जाने का गीत सुनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।1।।

पहले कपड़े सम्पूर्ण अंग को, भर शृंगार कर देता था।
जब अंगराग से पूरित तन, मन में उमंग भर देता था।
मृदु महक धरा से दूर हुयी, परफ्यूम ने धूम मचाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।2।।

जनक पिता बापू कहते, सन्तोष बहुत मिल जाता था।
भैया चाचा दीदी बेटी, सुनने से दिल खिल जाता था।
पापा कहने से मिटा लिपिस्टिक जब, डैडी का चलन बढ़ाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।3।।

धोती कुर्ता रमणीय वेष, खद्दर की टोपी दूर हुयी।
डिस्को क्लब सिगरेट चषक, की भार बहुत भरपूर हुयी।
कटपीस के कटे ब्लाउज ने, भारत में आग लगाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।4।।

बच्चा पैदा होते ही अब, अंग्रेजी मे ही रोता है।
ए बी सी डी को सीख सीख, हिन्दी की गति को खोता है।
सब छोड़ संस्कृति देवों की, दानव प्रवृत्ति अपनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।5।।

थे राम कृष्ण अवतार लिये, यह बात बताया भारत में।
चैत्र मास से ऋषियों ने, नव वर्ष चलाया भारत में।
चले गये अंग्रेज मगर, अंग्रेजी नव वर्ष मनाया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।6।।

काल खोलकर मुँह बैठा, पर हैप्पी बर्थ मनाते है।
मन मन्दिर में जो प्रेम छिपा, आई लव यू कह कर गाते है।
सम्पूर्ण नग्नता छाने को, यह पाँप का म्यूजिक आया है।।
वो चले गये कुछ छोड़ यहॉ जिसको हमने अपनाया है।।7।।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

खिचड़ी


मकर संक्राति को पूर्वी उत्तर प्रदेश में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन का महत्व आध्यात्मिक एवं पौराणिक रुप में बहुत ज्यादे हैं। गुरु गोरखनाथ का मंदिर गोरखपुर में खिचड़ी पर्व को बहुत सुशोभित हो जाता है। कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ की खिचड़ी गोरखपुर में ही पक पायी थी। इस खिचड़ी पर्व पर पहले की सामाजिक व्यवस्था और आज की व्यवस्था में काफी फर्क है। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ अर्थ की महिमा हर जगह दिखायी देती है। वहीं पूर्व में (आज से 20वर्ष पूर्व) सहयोग प्रेम सहिष्णुता दया परोपकार की भावना दिखायी देती थी। मुझे याद है वह दिन जिस समय खिचड़ी का त्यौहार आने से दस पन्द्रह दिन पहले चूड़ा, चावल, मक्के इत्यादि को भुनाने के लिये झींगुर गोंड़ के यहाँ जाना पड़ता। झींगुर के परिवार के विनष्ट हो जाने के बाद प्रानपुर गांव के गोड़ों ने कुछ वर्षों तक यह परम्परा निबाही। बाद में कन्ता भाई की औरत का अपना चूल्हा कुछ दिनों तक चलता रहा। भुने हुये अनाज को भूजा भी कहा जाता है। भूजा भून लेने के एवज में चूल्हा के मालिक को भूजा ही देना होता। कइयों का भूजा तो किसी विशेष कमी के कारण सही नही हो पाता जिस पर अन्धविश्वासवश लोग कहते कि नजर लग गयी है। अनुमान लगाये जाते कि फलां की औरत ने आते समय टोक दिया था, फलां की औरत ने मुझसंे ऐसा कहा था कि आदि-आदि बातें सिद्ध ही कर देती। जादू टोना चुड़ैल की बाते उस समय ज्यादे थी। यह समय भी बीता। अब ऐसे चूल्हे सामूहिक तौर पर नहीं बनाये जाते। हर घरों का अपना चूल्हा हो गया है। शीतलहरी आज पहले से भी अधिक हो रही है। गन्ने के गेंड़, पुआल और पत्ती खिचड़ी के दिन तक सूख नहीं पाती। खोइयाँ अब नहीं मिलता। लाई (लड्डू ) बनाने के लिये अब उतना भूजा नहीं भुना जाता जितना पहले। पहले की सामाजिक व्यवस्था के बारे में अगर बात करें तों लोगों को कहानी या मनगढ़न्त बात लगेगी। 1970 के आस पास जब मै होश संभाला चुका था। उस समय ब्राह्मण में दुर्गा मिश्र के खानदान के लोग या खुद दुर्गा मिश्र ब्राह्मण घराने के लिए जनेऊ लाते। वहीं सुदामा हजाम या उनके पूर्ववर्ती खानदान के रामनाथ हजाम या गनपत हर घरों में दातुन पहुंचाने का काम करते थे। दातुन नीम या महुआ के छुआ करते थे। कुम्हारों में रतनपुरा गांव के कुछ कुम्हार मिट्टी के बरतनो को दो तीन दिन पहले पहुंचा देते थे। खिचड़ी पर्व पर मिट्टी के बरतनों में लड्डू, चावल, अदरक, तील, नीबू, नमक रखकर स्नानोपरान्त दान किया जाता और पंडित जी के घर के लोग सायंकाल उसे ले जाने के लिये आते। दोपहर बाद कुम्हार, हजाम के घर के लोग लाई (लड्डू) लेने के लिये आते और पूरे गाँव से संग्रह कर बोरों में भर कर ले जाते। करीब 10 बजे से भिखमंगे, भंगते भी दरवाजों पर आने लगते। दिन में दही के साथ कुछ घरों में चिउड़ा या भुने हुये अनाज के गुड़ में बने हुये लड्डू खाया जाता। इतना ही बहनों के घर भी इन लड्डुओं को पहुंचाया जाता। गांव में कुछ यादव घराने और कमकर घराने से ब्राह्मण भोज का निमंत्रण आता। बाबूराम मिस्त्री के घर तो करीब 2000 सन् तक यह परम्परा चलती रही। हमारे दादाजी या चाचाजी (हरवंश) या उनके पिता चन्द्र गोकुल जी यजमानों के यहाँ खिचड़ी बनाने में सिद्ध हस्त थे। खिचड़ी बनवाने वाले ब्राह्मण घरानें में आकर सवेरे ही निमंत्रण दे जाते और बनाने वाले को समय से आ जाने की बात भी कह जाते। एक बार मुझे बालगोविन्द कमकर के यहाँ खिचड़ी बनाने के लिये आना पड़ा। याद है जब मै पहुंचा चावल, दाल, आलू तथा फूलगोभी कटा हुआ, नमक मिर्चा मशाला, तेल, सूखी लकड़ी, मिट्टी के बरतन मुझे सौंप दिये गये। समस्या यह थी कि पहले खिचड़ी बनाऊँ या सब्जी। सब्जी बनाने का दृढ़ निश्चय लेकर कार्य प्रारम्भ कर दिया। तेल कम था, मांगने पर घर वालों ने थोड़ी बहाने बाजी दिखानी शुरु की। चूल्हा धुँआ छोड़ रहा था। आँखे फूंक लगाने से लाल हो गयी। क्या करता, ब्राह्मण होने के नाते अपने बनाना ही था नहीं तो दूसरों के हाथ का बनाया अन्य ब्राह्मण नहीं खाते। मदद की कोई संभावना नहीं थी। खूब बढ़िया दहीं और घी भी भोजन के साथ खाने को दिखाई दे रहा था। जैसे तैसे सब्जी बन गयी। नमक कम ही था। अब खिचड़ी बनाने की बारी आई। माताजी ने बहुत समझाया था कि ऐसे ऐसे खिचड़ी बन जायेगी। मैने माताजी का स्मरण कर खिंचड़ी बना ही डाला। माताजी की कृपा से खिचड़ी भी ठीक बनी। जब थोड़ा सा समय बाकी था तभी चिरकुट को अन्य ब्राह्मणों को बुलाने के लिये भेज दिया गया। सभी ब्राह्मण और ब्राह्मण पुत्र अपना-अपना लोटा लेकर आ गये। भोजन की पंक्ति बैठ गयी। बुजुर्ग ब्राह्मणों ने अपना कुर्ता बनियान निकाल लिया। घी दही को भरपूर लेकर भोजन प्रारम्भ हो गया। यजमान ने नकद में 2-2 रुपये सामने रख दिये। पंडित जी प्रसन्न थे। यजमान खिलाकार संतुष्ट। मिट्टी के बरतन में दो दो बड़े बड़े भुने हुये अन्न के लड्डू तथा दान किया हुआ चावल आलू गोभी सबको पाँव छूकर यजमान द्वारा दिया गया। आज समय बदल गया है। ब्राह्मण अब सिले हुये कपड़े ही नहीं बल्कि जूता पहने हुये भोजन (बफर सिस्टम) कसे में भी संकोच नहीं करता। खिचड़ी का पर्व तो आता है पर न तो हजाम दातुन लाता, कुम्हार बरतन और गोंड़ो के यहाँ चूल्हा भी नहीं होता। कन फुंकवा शिष्य कभी कभी गुरुजी को अपने घर खिंचड़ी बनाने के लिये बुलाते पर वह मिठास नही होती। घी पराग और आंचल का होता। दही का नामोनिशान नहीं। हाथ का पिसा मशाला नही होता, कम्पनी का बना मिक्स पैकेट से काम चलाना पड़ता। पैर छूकर आर्शीवाद लेने से शरम आती। यजमान शाम को मदिरालय को गया रहता है। शाम को अब खिचड़ी नहीं बनती। रचनाकार डाॅ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय ’नन्द’ रा. इ. का. द्वाराहाट अल्मोड़ाउत्तराखण्ड